रायपुर। साहित्य, संस्कृति, शिक्षा, पत्रकारिता इन सभी आयामों में गांधी अग्रगामी दिखाई देते हैं। लोक जीवन में प्रवहमान मूल्यों और रस को गांधी जी ने आत्मसात किया था और उसे बहुगुणित करके लोक को लौटाया। स्वाधीनता संग्राम के अनेक ज्ञात-अज्ञात लोगों का जीवन गाँधीमय रहा है। गांधी के स्वराज्य में समाज के आखिरी आदमी की भी चिंता है। प्रेमचंद, सियारामशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, दिनकर, जैनेंद्र, भवानीप्रसाद मिश्र से लेकर नए दौर के रचनाकारों ने गांधी विचारों को कई कोणों से अभिव्यक्त किया है।
यह बात पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर की साहित्य एवं भाषा अध्ययनशाला में आयोजित हिंदी साहित्य और गांधीवाद पर केंद्रित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में हिंदी के विभागाध्यक्ष प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने कही।
संगोष्ठी का उद्घाटन छत्तीसगढ़ राज्य के कैबिनेट मंत्री अमरजीत भगत और कुलपति प्रो केसरीलाल वर्मा ने किया। इस मौके पर उन्होंने छत्तीसगढ़ मित्र पत्रिका के गांधी विशेषांक का विमोचन भी किया। प्रेक्षागृह परिसर में गांधी जी के छायाचित्रों पर आधारित प्रदर्शनी भी लगाई गई है। संगोष्ठी में महात्मा गांधी के विचारों पर आधारित शोध पत्र एवं लेखों का वाचन किया जा रहा है।

वक्ताओं ने कहा कि लोक का गांधी से और गांधी से लोक का रिश्ता इतना गहरा है कि वे एक दूसरे के बगैर अधूरे लगते हैं। महात्मा गांधी के कथनानुसार लोकगीतों में धरती, पर्वत, नदियां और फसलें गाते हैं। उत्सव, मेले और अन्य अवसरों पर मधुर कंठों से लोक समूह लोकगीत गाते हैं। भारतीय इतिहास और संस्कृति में गांधी ने अपने मन, वचन और कर्म की एकता से नया मोड़ उपस्थित किया। उन्होंने सत्य के प्रति निष्ठा को बड़े साहस के साथ निभाया था। उसी के बल पर उन्होंने अमरता पाई है। गांधी की यह छबि इस देश के लोक मानस में गहरे में पैठी है। लोक साहित्य में एक अलौकिक नायक के रूप में गांधी उभरे हैं। संगोष्ठी में विभिन्न सत्रों के साथ लोक अंचल की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी दी जा रही हैं।

