नई दिल्ली/इंदौर। नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (NSD) में तीसरे वर्ष के डिप्लोमा छात्रों के लिए ‘फ़ॉरेन इनपुट प्रोग्राम’ के तहत दो अंतरराष्ट्रीय नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन किया गया। रशियन थिएटर इंस्टीट्यूट (GITIS इंटरनेशनल) के सहयोग से प्रस्तुत किए गए इन नाटकों ने भारत और रूस के बीच सांस्कृतिक और कलात्मक संबंधों को एक नई ऊंचाई प्रदान की है।
इस विशेष आयोजन में एलेना इसाएवा द्वारा लिखित व नतालिया शुर्गानोवा द्वारा निर्देशित ‘द कोर्टयार्ड एज़ ए वैनिशिंग स्पीशीज़’ और अलेक्जेंडर ओस्ट्रोव्स्की द्वारा लिखित व अलेक्जेंडर खुखलिन द्वारा निर्देशित ‘स्टॉर्म’ का मंचन किया गया।
गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में हुआ उद्घाटन:
समारोह का उद्घाटन एनएसडी के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने किया। इस मौके पर भारत में रूसी राजदूत की पत्नी मैडम डायना अलीपोवा और रूसी संघ के दूतावास में संस्कृति काउंसलर सुश्री यूलिया आर्यवा विशेष रूप से उपस्थित रहीं। यह ‘फ़ॉरेन इनपुट प्रोग्राम’ एनएसडी के छात्रों को अंतरराष्ट्रीय थिएटर निर्देशकों के साथ काम करने और दुनिया की विभिन्न रंगमंच परंपराओं को बारीकी से समझने का अवसर प्रदान करता है।
‘द स्टॉर्म’: पितृसत्ता और मुक्ति की जद्दोजहद:
आयोजन का मुख्य आकर्षण रूसी क्लासिक नाटक ‘द स्टॉर्म’ (मूल रचना: ग्रोज़ा) का हिंदी रूपांतरण रहा। वोल्गा नदी के किनारे बसे काल्पनिक शहर ‘कालिनोव’ पर आधारित यह नाटक कैटेरिना नाम की एक संवेदनशील महिला की कहानी है। अपनी क्रूर सास ‘कबानिखा’ के दमनकारी शासन और एक नाखुश शादी की बेड़ियों में जकड़ी कैटेरिना की आज़ादी और सच्चे प्यार की तड़प को इस नाटक में गहराई से उकेरा गया है। जाने-माने थिएटर कलाकार और एनएसडी के पूर्व छात्र अमिताभ श्रीवास्तव ने इसका बेहतरीन हिंदी अनुवाद किया है, जिससे यह रूसी क्लासिक भारतीय दर्शकों के दिलों में सीधे उतर सका।
शानदार निर्देशन और तकनीकी भव्यता:
रूसी निर्देशक अलेक्जेंडर खुखलिन ने इस नाटक को एक गहन रिहर्सल प्रक्रिया, इम्प्रोवाइज़ेशन और ‘कोलेबोरेटिव एक्सप्लोरेशन’ के ज़रिए तैयार किया। लगभग चार घंटे तक चलने वाले इस नाटक ने अपनी भव्य मंच-सज्जा, शानदार लाइटिंग, मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद और छात्रों के दमदार अभिनय से दर्शकों को अंत तक बांधे रखा।
कलाकार और रचनात्मक टीम का उत्कृष्ट प्रदर्शन:
मंच पर छात्रों के अभिनय ने गहरी छाप छोड़ी। कैटेरिना के रूप में ममता जैसवार और क्रूर सास (कबनिखा) के रूप में महक भार्गव ने प्रभावशाली अभिनय किया। इनके अलावा तिखोन (पंकज कुमार शर्मा), बोरिस (सौरभ कुमार पांडे व दशरथ दास), डिकोय (पीयूष वर्मा), वरवरा (अदितियन काल्टा), कुलीगिन (ईशान जिंदल), कुदरीश (श्रीकांत कामलेकर), शापकिन/फेकलूशा (सुनील भादू), ग्लाशा (श्रुति शर्मा) और कुम्मी (दुर्गेश्वरी नारायण अंबोरे) ने अपने किरदारों में जान फूंक दी।
पर्दे के पीछे रचनात्मक टीम में शेखर कांवट (सहयोगी निदेशक), विशाला आर. महाले (लाइट डिजाइन), शुभम सिंह (साउंड डिजाइन), रिया पंवार (पोशाक डिजाइन) और उत्कर्ष दीक्षित (भाषा दुभाषिया) ने इस प्रस्तुति को एक पूर्ण और भव्य नाट्य अनुभव में तब्दील कर दिया। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि कला और मानवीय संवेदनाओं की कोई भाषाई सीमा नहीं होती। आगे पढ़िये -हँसते-हँसते दिल दुखा देने वाली नौटंकी https://indorestudio.com/babuji-nautanki-nsd-theatre-review/
एनएसडी में भारत-रूस कला संगम: ‘द कोर्टयार्ड’ और ‘द स्टॉर्म’ का मंचन
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