विनीत तिवारी, इंदौर स्टूडियो। रंग गुरू प्रसन्ना ‘एक्टिंग’ में सफल होने के लिये कई बातों की ओर ध्यान खींचते हैं। आइये जानने की कोशिश करते हैं कि रंगमंच पर अभिनय करने वाला एक अभिनेता कैसे सफल हो सकता है?
परस्पर सहयोग और टीम वर्क है थियेटर: प्रसन्ना के कहते हैं- ‘थिएटर एक सामूहिक कर्म है, इसलिए आपका काम केवल अपने अभिनय को ठीक करने से पूरा नहीं होता, आपको अपने साथी कलाकारों पर भी ध्यान देना होता है। एक कलाकार अपनी भूमिका कितने ही अच्छे से तैयार कर ले, उसे अपने साथ मौजूद कलाकार के सहयोग की ज़रूरत रहती ही है। इसलिए नाटक परस्पर सहयोग सिखाता है। इसका ध्यान रखना ज़रूरी है।
श्रम का सम्मान और शरीर है केंद्र: प्रसन्ना अपनी कार्यशालाओं में अभिनय को लेकर कुछ बुनियादी बातों पर लगातार ज़ोर देते हैं, जो उनकी तकनीक का सार हैं। उनकी नज़र में शरीर ही केंद्र है (The Body is the Centre) यानी अभिनय का मूल उपकरण शरीर है।
शरीर में भी बसते हैं विचार: उनका मानना है कि भावनाएँ और विचार केवल दिमाग में नहीं, बल्कि पूरे शरीर में बसते हैं। वे शारीरिक अभ्यास (Physical Exercises), लचीलेपन और शरीर की ‘मांसपेशियों की स्मृति’ (Muscle Memory) को जगाने पर ज़ोर देते हैं। उनका सूत्र है – ‘शरीर को साधो, अभिनय सध जाएगा’।
झूठ से सच को पकड़ने का खेल: मंच पर जो नाटक (Drama) चलता है-वह खेल झूठ-मूठ का है। उसमें प्रेम भी उतना ही झूठा है जितना हत्या या घृणा… लेकिन इस झूठ से सच को पकड़ने का खेल ही नाटक है। वे कलाकारों को सलाह देते हैं कि वे अपने आसपास काम करने वाले मजदूरों, कारीगरों को ध्यान से देखें। उनके काम करने की लय, उनके उठने-बैठने, औज़ार चलाने के ढंग में सहज अभिनय छिपा है। उनका कहना है, एक प्रामाणिक चरित्र को पाने के लिए – गहरा अवलोकन (observation) बेहद ज़रूरी है।
सांस (Breath) अभिनय का इंजन है : उनकी पद्धति में श्वास का बहुत महत्व है। वे सिखाते हैं कि कैसे सांस में बदलाव लाकर भावनाओं (क्रोध, भय, प्रेम) को नियंत्रित और प्रकट किया जा सकता है। आवाज़ का मॉड्यूलेशन और ऊर्जा का स्तर पूरी तरह से श्वास पर निर्भर करता है। वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि ज़रूरी नहीं कि आप पहले महसूस करें और फिर अभिनय करें। कभी-कभी एक बाहरी शारीरिक क्रिया (जैसे तेज़ चलना या काँपना) आपके अंदर उस भाव को अपने आप जगा देती है।
बेजान चीज़ों से जीवंत संबंध बनाना ज़रूरी: एक अभिनेता मंच पर कई चीज़ों (प्रॉप्स) का इस्तेमाल करता है। प्रसन्ना सिखाते हैं कि उन बेजान वस्तुओं के साथ एक जीवंत संबंध कैसे स्थापित किया जाए, ताकि वे आपके अभिनय का हिस्सा बन जाएँ। यह एक विद्यार्थी पर ही निर्भर करता है कि वह गुरु से कितना हासिल कर पाता है, लेकिन प्रसन्ना का ख़ुद का जीवन भी अपने आप में एक शिक्षा है।
प्रसन्ना की खूबी-उनकी सादगी और दर्शन: प्रसन्ना की खूबी उनकी सादगी है। वे साधारण तरह से रहते हैं और थियेटर से जुड़ने वाले नये कलाकारों को अपना योगदान देते रहते हैं। वे समाज में बेहतर बदलाव के ख़्वाब भी देखते हैं। उन बदलावों को वे कई विचारकों के दर्शन में खोजते हैं। उन्हें गांधी भी चाहिए, आंबेडकर भी, सावित्रीबाई फुले, ज्योतिबा, मार्क्स और भगत सिंह तथा जैसे क्रांतिकारी विचारक भी। प्रसन्ना अपनी वयोवृद्ध उम्र में भी सांस्कृतिक ज़रूरतों को पूरा करने और युवा पीढ़ी में अपने अनुभव बांटने की यथाशक्ति कोशिश कर रहे हैं। File: आलेख में दी गई तस्वीरों में मंच पर नज़र आ रहे हैं क्रमश: अभिनेता अरूण काटे और उनका रंगसमूह, fiona, प्रीता माथुर ठाकुर और राजेंद्र गुप्त के साथ हिमानी शिवपुरी। आगे पढ़िये- AI के दौर में VOICE ACTOR का क्या होगा? https://indorestudio.com/ai-ke-daur-me-voice-actor/









