Wednesday, May 13, 2026
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‘मुक्ति का महायज्ञ: स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष का अभिनव संगीत रूपक

विनय उपाध्याय, इंदौर स्टूडियो। आज़ादी के अमृत महोत्सव के निमित्त स्वराज और स्वाधीनता के पहलुओं को जब नए सिरे से याद करने और देखने-परखने का सिलसिला जारी है तब ‘मुक्ति का महायज्ञ’ शिद्दत से जेहन में कौंधता है। गीतकार और लेखक डॉ. राम वल्लभ आचार्य की लेखनी से रचा गया यह एक ऐसा अभिनव और अनुपम रूपक है जिसने रेडियो और दूरदर्शन से लेकर रंगमंच तक ख़ासा रोमांच पैदा किया है। रूपक का यह संगीत सुनने पर आज भी जैसे स्वतंत्रता संग्राम का पूरा आंदोलन सामने आ खड़ा हो जाता है। मधुकली युव-वृन्द द्वारा सहगान सुनने पर हर बार एक नई अनुभूति और आज़ादी के प्रति चेतना से भर देता है।आखर जगत के आलोकित शब्द-शिल्पी: ‘डॉ. आचार्य हिन्दी के आखर जगत में आलोकित एक ऐसे शब्द-शिल्पी के रूप में समादृत हैं जिनके गीत अनूप जलोटा, हरिओम शरण और प्रभंजय चतुर्वेदी से लेकर कल्याण सेन और कीर्ति सूद जैसे जाने-माने गायकों की आवाज़ में प्रसिद्धि के गगन नापते रहे हैं। निश्चय ही रचनात्मक कसौटी पर यह रूपक एक अनुभव समृद्ध लेखक के कला-कौशल का प्रमाण है। एक और बड़ी बात यह है कि डॉ.राम वल्लभ पेशे से चिकित्सक हैं। उन्होंने बीएससी की पढ़ाई के बाद बीएएमएस करने वाले रामवल्लभ जी एक आयुष डॉक्टर हैं। परंतु उनका मन साहित्य और गीत रचना में लगा रहा, इसलिये वे निरंतर रचना के अपने चुने संसार में साधनारत रहे। उनके नौ गीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। तीन संग्रह शीघ ही आने वाले हैं। इनमें एक खंडकाव्य भी है। डॉ.राम वल्लभ को कई विशिष्ट पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया है।  (चित्र में मुक्ति का महायज्ञ के लेखक डॉ. राम वल्लभ आचार्य)
याद आती हैं उत्सर्ग की गाथाएँ: ‘मुक्ति का महायज्ञ’ रूपक के पाठ से गुज़रते हुए हमें स्वाधीनता संग्राम से जुड़ी उत्सर्ग की गाथाएँ याद आने लगती हैं। इतिहास के पन्नों पर नज़र जाती है तो अंग्रेज़ी हुकूमत और जुल्मों-सितम से जुड़ी एक-एक तारीख़ उभरती है। वहीं मुक्ति के लिए छटपटाते देश में संगठित जन प्रतिरोध का मुखर स्वर दिखाई देने लगता है। वह दौर जब सच्चे राष्ट्रभक्त लामबंद हुए। प्रभावी नेतृत्व प्रकट हुआ हुआ और कश्मीर से कन्याकुमारी तक स्वाधीनता का आंदोलन हर देशवासी का मकसद बन गया। सिलसिला शुरू हुआ 1857 से। चिंगारी शोला बनती गई। 15 अगस्त 1947 की सुबह भारत की भाग्य रेखा ने दुनिया के इतिहास में महाविजय की इबारत उकेर दी। आज़ादी का यह संघर्ष, वतन परस्तों का त्याग, संकल्पों का संदेश आज हमारी धरोहर है। लेकिन क्या हमारी चेतना में कभी हमारा बीता कल कौंधता क्या हम आज़ादी के उसूलों की हिफाज़त के फर्ज़ अदा कर रहे हैं? रूपक के गीतों में रचियता डॉ. राम वल्लभ आचार्य इन सवालों को भी मथते हैं। बड़ी रोचक है इस रूपक की कहानी: इस रूपक के लिखे जाने के संयोग की भी एक रोचक कहानी है। वर्ष 1997-98 को शासन द्वारा स्वतंत्रता के स्वर्ण जयंती वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा की गयी थी। तब वर्ष भर स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया गया था। इसी तारतम्य में दूरदर्शन द्वारा कमीशन्ड कार्यक्रमों के लिये कुछ विषय निर्धारित किये गये थे जिनमें एक विषय स्वतंत्रता संग्राम संबंधी गीतों की सांगीतिक प्रस्तुति का भी था।आधी रात उठकर लिखे दस में से आठ गीत: प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तिथि से एक दिन पूर्व सायंकाल आचार्यजी के मित्र ने स्वतंत्रता संग्राम पर केन्द्रित 10 गीत माँगे। अगले दिन सुबह 10 बजे के पूर्व उन्हें ये गीत देने थे। राम वल्लभजी बताते हैं कि उस रात लगभग दो बजे उनकी नींद खुली और स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि मन-मस्तिष्क में घूमने लगीं। धीरे-धीरे एक के बाद दूसरे गीत की रचना होती गयी। इस तरह आठ गीत सुबह छह बजे तक लिखा गये। तब दो पूर्व रचित राष्ट्र भक्ति गीत मिलाकर दस गीत उन्हें समय से पूर्व दे दिये। दूरदर्शन ने प्रस्ताव जमा कर दिया लेकिन वह प्रस्ताव स्वीकृत नहीं हुआ।मन में आया संगीत रूपक का विचार: दूरदर्शन की अस्वीकृति पर आचार्यजी को निराशा तो हुई किन्तु बाद में इनमें से पाँच गीतों को लेकर स्वतंत्रता के 90 वर्ष के संग्राम पर संगीत रूपक बनाने का विचार उन्हें आया। इस पूरे इतिहास को मात्र 10-12 मिनिट में समेटना एक चुनौती थी और चुनौती यह भी थी कि यह सब विश्वसनीय, प्रामाणिक और निर्विवाद हो। अब आचार्यजी ने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की पुस्तकें पढ़ीं, नोट्स लिये, घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण संकलित किया और प्रमुख स्वतंत्रता सेनाननियों की जानकारी संकलित की। इसके बाद रूपक का एक ढाँचा तैयार किया।स्वतंत्रता संग्राम के चार मुख्य पक्ष: आचार्य जी ने अनुभव किया कि इस संग्राम के मुख्यतः चार पक्ष रहे। पहला 1857 की असफल क्रांति का जिसमें विभिन्न राजे रजवाड़ों का अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष था। दूसरा महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अहिंसक आन्दोलन तथा तीसरा विप्लवी क्रान्तिकारियों का सशस्त्र प्रतिरोध था। चौथा पक्ष था नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज का सैन्य अभियान।अन्त में सूत्रधार द्वारा वर्तमान स्थितियों पर चिंतन की आवश्यकता प्रतिपादित करता यह संगीत रूपक मुकम्मल हुआ। इसे आकाशवाणी भोपाल के संगीत विभाग को प्रेषित किया। कुछ दिन बाद आचार्यजी को सूचित किया गया कि 15 अगस्त को दिनभर जिला स्थानों पर होने वाले कार्यक्रम प्रसारित किये जायेंगे, अतः इसका प्रसारण संभव नहीं होगा।जब एक नहीं खुली दो राहें : कुछ दिन बाद भोपाल के समाचार पत्रों में पं. लालमणि मिश्र संगीत समारोह में ‘मधुकली वृन्द’ द्वारा वृन्दगान प्रस्तुति का समाचार पढ़ा तो पं. ओम प्रकाश चौरसिया जी को इस संगीत रूपक की प्रति उन्होंने दी।  बकौल आचार्य, स्वतंत्रता की स्वर्णजयंती के समापन के अवसर पर आकाशवाणी ने यह पांडुलिपि माँगी और इसके प्रसारण का अनुबंध कर लिया। 12 अगस्त को होने वाले पं. लालमणि मिश्र संगीत समारोह में भी इसकी प्रस्तुति का रास्ता खुल गया। भोपाल के रवीन्द्र भवन में मधुकली द्वारा इसे वृन्दगान के रूप में लगभग तीस वृन्द गायकों ने पेश किया और इस प्रस्तुति को व्यापक सराहना मिली। अनेक लोगों के आग्रह पर ऑडियो सीडी तथा कैसेट बनवाकर रिलीज किये गये। संगीत रूपक बना मंच की सम्मोहक प्रस्तुति: फिर किसी के सुझाव पर इसे रंगकर्मी मनोज नायर की कोरियोग्राफी के साथ पुनः प्रस्तुत किया गया तो इसका अद्भुत प्रभाव हुआ। इसके बाद इसकी वीडियो सीडी भी बनायी गयी। इसकी चर्चा देश भर में हुई और अनेक आयोजनों ने इसकी प्रस्तुति के लिये चौरसिया जी से संपर्क किया गया। बाद में इसकी प्रस्तुतियाँ भारत भवन भोपाल, मानव संग्रहालय भोपाल के अलावा सीहोर सागर एवं अन्य स्थानों के साथ ही बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के सभागार में भी किया गया। दूरदर्शन से भी इसका प्रसारण कई बार हुआ।अभिनव प्रयोग का नया रसायन: पंडित चौरसिया के इस सर्वथा अभिनव प्रयोग में कविता, संगीत, वृन्दगान और नृत्य अभिनय के आयाम मिलकर एक नया रसायन पैदा करते हैं। ग़ौर करने का पहलू यह कि इस रूपक में मधुकली युव-वृन्द के शौकिया कलाकारों ने गायन और अभिनय का दोहरा दारोमदार बखूबी निभाया। बीएचयू (बनारस) का भव्य सभागार उस शाम दर्शकों से खचाखच था और प्रस्तुति के बाद बधाईयों का सिलसिला देर तक चलता रहा। लगभग सवा घंटे के इस ध्वन्यांकित रूपक में वाचक स्वर विवेक मृदुल का है जबकि गायक समूह में रीना सिन्हा, संदीपा पारे, शोभना प्रधान, दिव्यता जैन, हर्षा, हिमानी, एकता गोस्वामी, देवना चौरसिया, उमा कोरवार, शुभा उपलपवार, पुनीत वर्मा, सुदीप सोहनी, गौरव शर्मा, गोपाल लेले, प्रशांत धवले, के.एस. अय्यर सहित करीब दो दर्जन कलाकार शामिल थे।
(विनय उपाध्याय वरिष्ठ पत्रकार, कला समीक्षक और उदघोषक हैं। कला, साहित्य और सांस्कृतिक आयोजनों पर  निरंतर अपने लेखन और रिपोर्ट्स के लिये पहचाने जाते हैं।)

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