शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘ताजमहल का टेंडर’ नाटक पिछले 28 साल से क्यों सफलता के साथ चल रहा है, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) के ‘समर थियेटर फेस्टिवल’ में दर्शकों को इसका प्रमाण एक बार फिर देखने को मिला। 2 घंटे की अवधि के इस नाटक में दर्शक न सिर्फ रह-रहकर हंसते रहे, बल्कि इसके चुटीले और दोहरी मार करने वाले संवादों का असर भी अपने भीतर महसूस करते रहे।
यह नाटक लालफीताशाही और नौकरशाही (ब्यूरोक्रेसी) में फैले भ्रष्टाचार पर ज़बरदस्त प्रहार करता है। साथ ही जहाँ भी गुंजाइश दिखती है, वहाँ यह वक्त की नब्ज़ पर हाथ रखता है और अपने प्रासंगिक संवादों से दर्शकों को कभी गुदगुदा देता है, कभी झनझना देता है। मिसाल के लिए, नाटक के मुख्य किरदार शाहजहाँ के इस संवाद पर ज़रा गौर कीजिए, इसमें आप समकालीन हालात की प्रतिध्वनि महसूस कर सकते हैं— ‘And you must work from home!’
1998 से मंचित हो रहे इस नाटक की इस बार सबसे बड़ी खूबी इसके मुख्य किरदारों की मूल कास्ट (Original Cast) का होना रही। अजय शुक्ला द्वारा लिखित इस नाटक की परिकल्पना, निर्देशन और संगीत रचना एनएसडी के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने की है। इसके साथ ही, इस बार फिर उन्होंने नाटक के मुख्य किरदार बादशाह शाहजहाँ की भूमिका निभाई और मंच पर उसे जीवंत कर दिया। मंच पर उनके प्रवेश (एंट्री) से लेकर प्रस्थान (एक्ज़िट) तक, हर दृश्य में उनका अभिनय देखने काबिल था। बुज़ुर्ग बादशाह के रूप में उनके बैठने और फिर बैठने-उठने, ज़ख़्म का इलाज कराने या स्ट्रेचर पर आकर अपने आभूषण, गुप्ता को सौंपने जैसे कई दृश्य हमेशा के लिये याद रह जाते हैं।
उन्होंने अपने अभिनय से साबित किया कि वे रंगमंच के एक कुशल और सिद्धहस्त अभिनेता हैं। उन्होंने अपनी भूमिका को बड़ी सहजता से जिया। वे एक ऐसे अचूक और मँजे हुए अभिनेता की तरह नज़र आए, जो मंच पर अपने अभिनय को लेकर ज़रा भी तनाव में नहीं है, बल्कि अपने किरदार के साथ बेहद सहजता से खेलता है। वे अपने चरित्र को इस तरह आत्मसात कर चुके हैं कि उन्हें ये बखूबी पता है कि कब, कितना, कहाँ और क्या करना है तथा अपने चरित्र को किस तरह जीना और प्रस्तुत करना है!
चित्तरंजन त्रिपाठी ने जितना उत्कृष्ट अभिनय किया, भ्रष्ट और शातिर चीफ इंजीनियर (गुप्ता) के रूप में श्रीवर्धन त्रिवेदी का अभिनय भी उतना ही प्रभावशाली रहा। वे भी इस नाटक के शुरुआती दौर के कलाकार रहे हैं और उन्होंने अपने किरदार को बड़ी दक्षता से निभाया। उन्होंने हर दृश्य के उतार-चढ़ाव और किरदार के ग्राफ का अपने अभिनय में पूरा ध्यान रखा। टेबल पर बैठकर टेंशन में उनका पैर हिलाने का छोटा सा दृश्य भी उनके चरित्र की विशेषता बन गया।
नाटक के इन दोनों आधार स्तंभों ने शुरुआत से ही इसके सफल मंचन को तय कर दिया। नाटक में जहाँ भी मौका मिला, श्रीवर्धन के चर्चित टीवी क्राइम शो ‘सनसनी’ के मशहूर संवाद— “गौर से पहचान लीजिए इस शख्स को…” का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया, जिसे सुनकर दर्शक अपनी हंसी नहीं रोक सके।
चित्तरंजन और श्रीवर्धन के साथ ही ‘भैया जी’ और ‘महिला नेता‘ के रूप में क्रमशः राजेश शर्मा और कविता कुंद्रा भी मूल कास्ट का हिस्सा रहे। उनके साथ ‘मुरारी लाल’ बने बृजेश शर्मा और ‘सेठी’ की भूमिका में पराग सरमाह ने भी अपने किरदारों को बहुत ही शानदार तरीके से अभिनीत किया। नाटक में शाहजहाँ के सूट-बूट पहने और काले चश्मे वाले सचिवों के साथ-साथ कन्हैयालाल, औरंगज़ेब, मुमताज़ और लड़का-लड़की की भूमिकाओं में शिव प्रसाद, मुजीबुर रहमान, बिक्रम लेपचा और पोतशंगबम रीता देवी ने भी दर्शकों को प्रभावित किया।
रेपर्टरी के कलाकारों की सबसे बड़ी विशेषता अपने चरित्र की बारीकियों पर किया गया काम था। सभी ने अपने किरदारों के हाव-भाव (mannerisms), बोलचाल और भाषा-शैली को बखूबी अंगीकार किया। मिसाल के तौर पर, सेठी का ‘अस्सी-तुस्सी, सच्ची-मुच्ची, लस्सी-पुच्ची’ वाला संवाद और अंदाज़ दर्शकों पर अपनी अमिट छाप छोड़ गया।
नाटक की एक और बड़ी खूबी इसका संगीत है, जो ख़ुद चित्तरंजन त्रिपाठी की देन है। इसके थीम सॉन्ग ‘ड्रेमोक्रेसी’ से लेकर ‘आज की ताज़ा ख़बर’ जैसे गीत मूल्यों से भटके मीडिया के व्यावसायिक दृष्टिकोण (कमर्शियल एंगल) को दर्शाते हैं। नाटक में ‘मंज़िलें दूर हैं, फासले बहुत हैं’ गीत को खुद चित्तरंजन त्रिपाठी ने गाया है, जो उनकी बेहतरीन गायन प्रतिभा का परिचय देता है। नाटक के सभी गीत कहानी को आपस में जोड़ने के साथ-साथ उसे गति प्रदान करते हैं।
मेरे विचार में, यह उन चुनिंदा नाटकों में से एक है जिसे ड्रामा स्कूल के छात्रों के अध्ययन और प्रशिक्षण का हिस्सा बनाया जाना चाहिए और इस पर अलग से सत्र आयोजित होने चाहिए। इस तरह के सफल और बेहतरीन नाटकों को लेकर विशेष कोर्स भी शुरू किया जाना चाहिए, जिनमें रेपर्टरी के उत्कृष्ट नाटकों का प्रदर्शन (स्क्रीनिंग) और उनके कलाकारों व विशेषज्ञों के व्याख्यान शामिल हों। ऐसे कमसेकम 10 नाटकों का कोर्स हो सकता है।
अब ज़रा नाटक की कहानी पर गौर कीजिए। मुख्य किरदार हैं बादशाह शाहजहाँ, जिनकी बेगम मुमताज़ खुदा को प्यारी हो चुकी हैं। बादशाह शाहजहाँ अपनी मुमताज़ को प्यार से ‘मोमो’ कहते हैं और वे उनकी याद में एक आलीशान ताजमहल बनवाना चाहते हैं। मज़ेदार बात यह भी है कि ‘मोमो’ हर रात 12 बजकर 40 मिनट पर शाहजहाँ के ख्वाब में आती है। अपने इस सपने को हक़ीक़त में बदलने के लिए बादशाह शाहजहाँ सरकारी चीफ इंजीनियर गुप्ता को यह काम सौंप देते हैं।
ताजमहल के इस प्रोजेक्ट के बहाने भ्रष्ट चीफ इंजीनियर गुप्ता के हाथ मानो ख़ज़ाने की चाबी लग जाती है। 2 साल में पूरा होने वाले इस प्रोजेक्ट को वह 25 साल तक लटका कर रखता है। शाहजहाँ के पूछने पर वह हर बार यही जवाब देता है कि “हुज़ूर, काम बड़ी तेज़ी से चल रहा है, रात-दिन स्टाफ काम में लगा हुआ है।” इस बीच वह तरह-तरह के बहाने बनाकर बादशाह से करोड़ों रुपये ऐंठता रहता है। उससे जुड़े कॉन्ट्रैक्टर, सरकारी महकमों के बाबू और छुटभैये नेता भी बहती गंगा में हाथ धोते रहते हैं।
उधर, ताजमहल बनने की राह देखते-देखते बादशाह की उम्र ढलती जाती है। आख़िर 25 साल बाद जब भ्रष्ट चीफ इंजीनियर गुप्ता, शाहजहाँ को यह बताने पहुँचता है कि “आज ताजमहल बनाने के लिए टेंडर निकलने जा रहा है”, तब यह सुनते ही बादशाह, सदमे में अपना दम तोड़ देते हैं।
एक निर्देशक के रूप में चित्तरंजन त्रिपाठी ने नाटक के हर दृश्य को बेहद कसा हुआ और गतिशील (Pacy) रखा है। एक अभिनेता के रूप में वे ख़ुद भी पहले ही दृश्य से नाटक को रफ़्तार देते हैं। नाटक में जहाँ भी ज़रूरी लगता है, वे समकालीन और प्रासंगिक टिप्पणियों को जोड़कर दृश्यों को और भी अधिक रोचक बना देते हैं। यही वजह है कि अजय शुक्ला द्वारा लिखित यह नाटक अपने मूल कथ्य के साथ और भी दिलचस्प बन जाता है। नाटक की वेशभूषा, मंच-सज्जा और प्रकाश व्यवस्था—तीनों ही इस शानदार प्रस्तुति को मज़बूत सहारा देती हैं। यहां यह बताना भी ज़रूरी होगा कि इस नाटक को पहले भी रेपर्टरी के कलाकार सफलता से मंचित करते रहे हैं।
समर थियेटर की ताज़ा प्रस्तुति में एनएसडी रेपर्टरी के जिन कलाकारों का योगदान रहा, उनमें शिल्पा भारती, इप्शिता, पूनम, प्रतीक बडेरा, सत्येंद्र मलिक, अनुपमा, नीलिमा, अंकुर, अन्नत, शौर्य, नरेश, प्रसून और मनीष शामिल हैं। संचालन रेपर्टरी प्रभारी राजेश सिंह ने किया। नाटक में फेस्टिवल के दो दिन में कुल 3 शोज़ हुए।
मंचन के बाद चित्तरंजन त्रिपाठी ने कहा – ‘मुझे 28 साल पहले जब पहली बार इस नाटक के 4 शो करने का मौका मिला था, तब मैंने इसे तैयार करने में जमकर मेहनत की थी। इस तैयारी में मुझे अपने सहपाठियों और सीनियर्स का बड़ा सहयोग मिला था। तब हमें यह नाटक सिर्फ 12 दिन में ही तैयार करना था। वह हमने किया और शो कामयाब रहा। आज 28 साल बाद भी यह चल रहा है तो इसकी वजह हमारे दर्शक हैं जिन्होंने इसे इतना पसंद किया है। उन्होंने दोहराया, ‘किसी को लग सकता है कि मैं यहां का डायरेक्टर हूँ, इसलिये इसे दिखाया जा रहा है। पर यह सच नहीं है, दो साल पहले यहां ‘एपाइंट’ होने तक, मैं यहां नहीं था और तब भी यह नाटक इसी तरह चल रहा था’। श्री त्रिपाठी का रेपर्टरी की तरफ़ से प्रभारी राजेश सिंह ने गुलदस्ता देकर अभिनंदन किया।
नाटक के लिए सेट डिज़ाइन पंकज झा ने किया है, जबकि मंच निर्माण का कार्य विक्रम कुमार, तकमीर अहमद और रिज़वान ने संभाला है। लाइट डिज़ाइन श्याम साहनी की है, जिसका संचालन सुनील कुमार और शुभम ने किया। सुनीता चंद्रा राजवर इसकी कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर हैं, जिन्हें पूजा गुप्ता, पोतशंगबम रीता देवी, निशा और पार्वती बिष्ट का सहयोग मिला। नृत्य संरचना (कोरियोग्राफी) का दायित्व मेघना मलिक ने निभाया। संगीत की पुनर्रचना चित्तरंजन त्रिपाठी की रही, जिसमें रेपर्टरी कलाकारों के साथ स्नेहा मिश्रा ने गायन सहयोग दिया। स्वर्ण लता, मुकेश कुमार, हीरालाल रॉय, शिव प्रसाद ने मेकअप विभाग संभाला।
एक नज़र निर्देशक चित्तरंजन त्रिपाठी के कला सफ़र पर: हैदराबाद विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में एम.ए. और वर्ष 1996 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) से अभिनय में स्नातक चित्तरंजन त्रिपाठी- रंगमंच, टेलीविज़न और सिनेमा के एक बहुमुखी निर्देशक, लेखक, अभिनेता और संगीतकार हैं। ओडिसी गायन में ‘संगीत विशारद’ और यूके से ‘म्यूज़िकल थियेटर’ में प्रशिक्षित त्रिपाठी जी ने ‘ताजमहल का टेंडर’ समेत कई लोकप्रिय नाटकों का सफल निर्देशन किया है।
इसके साथ ही उन्होंने ‘दिल्ली 6’, ‘फैंटम’ और ‘तलवार’ जैसी चर्चित फिल्मों में अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ी है। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत ओडिया फिल्म ‘धौली एक्सप्रेस’ और हिंदी फिल्म ‘तेरा मेरा टेढ़ा मेढ़ा’ का निर्देशन भी किया है। रंगमंच और कला जगत में अपने इसी व्यापक अनुभव और अतुलनीय योगदान के साथ, वे वर्तमान में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD), नई दिल्ली के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। (इस समीक्षा के लेखक शकील अख़्तर, ‘इंदौर स्टू़डियो’ के संस्थापक संपादक होने के साथ-साथ सीनियर कल्चरल जर्नलिस्ट, क्रिएटर और क्यूरेटर हैं। थियेटर जर्नलिज़्म में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।) आगे पढ़िये – तीस साल बाद मंच पर फिर लौटा ‘अक्स तमाशा’ https://indorestudio.com/aks-tamasha-play-nsd-repertory-bhanu-bharti/
28 साल से क्यों चल रहा है नाटक ‘ताजमहल का टेंडर’?
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