इंदौर स्टूडियो, कला प्रतिनिधि। “जीवन ख़ुद एक रंगमंच है और हम सभी को हर क्षण इसे जीना पड़ता है। यदि कोई पूछे कि नाटक क्या है, तो इसका सरल उत्तर है—अपनी बात को प्रभावी ढंग से रखने की कला।” यह विचार उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत कला अकादमी के पूर्व निदेशक एवं सानंद इंदौर के अध्यक्ष जयंत भिसे ने व्यक्त किए। वे स्थानीय सारदा रामकृष्ण विद्या मंदिर में आयोजित ‘हल्ला-गुल्ला’ बाल नाट्य शिविर के शुभारंभ अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे।
शिविर का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ, जिसमें 35 छात्र-छात्राएं उत्साहपूर्वक भाग ले रहे हैं। इस अवसर पर स्कूल की ‘बड़ी माता’ प्रवराजिका अमितप्राणा जी, शिविर निदेशक तपन मुखर्जी, उप-प्राचार्य श्रीमती सीमा व्यास, सह-निर्देशक वरुण जोशी, वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण जोशी, समन्वयक श्रीमती शिल्पा सिंघल और श्रीमती श्वेता शर्मा उपस्थित थीं।
अपने संबोधन में श्री जयंत भिसे ने कहा कि नाटक न केवल संवाद की कला सिखाता है, बल्कि यह हमें संवेदनशीलता का पाठ भी पढ़ाता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा, “संवेदनशील होना मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। रंगमंच हमें अपने परिवार, समाज और देश के प्रति सजग बनाता है। यहाँ बच्चे साझा करने (शेयरिंग) की प्रवृत्ति सीखते हैं, जो व्यक्तित्व विकास के लिए अनिवार्य है।” जयंत जी ने बच्चों को एकता से बनने वाली सामूहिक शक्ति के बारे में भी बताया।
उन्होंने शिविर निदेशक तपन मुखर्जी के समर्पण की प्रशंसा की। कहा कि एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर रहने के बावजूद, बच्चों को रंगमंच की शिक्षा देना उनके सेवा भाव और कला प्रेम को दर्शाता है। उन्होंने तपन जी की गायन प्रतिभा और किशोर कुमार के गीतों की उनकी विशेष शैली का भी उल्लेख किया।
प्रवराजिका अमित प्राणा जी ने शिविर की सफलता की कामना करते हुए बच्चों को भगवान राम और कृष्ण के जीवन से प्रेरणा लेने की सीख दी। उन्होंने कहा, “श्रीकृष्ण को ‘नटवर नागर’ कहा जाता है और उनके जीवन के प्रसंगों को हम ‘लीला’ कहते हैं। लीला का अर्थ ही नाटक है। इसके पीछे के दर्शन को समझना ज़रूरी है, जैसे भगवान रामचंद्र जी के जीवन से हम समझते हैं कि एक आदर्श पुत्र, एक आदर्श पति और एक आदर्श मित्र को कैसा होना चाहिए। इसी तरह नाटक करना केवल मनोरंजन के लिए नहीं होता, यह वह कला है जिससे हमें मानवीय मूल्यों का पता चलता है और हमारी संवेदनाएं जागृत होती हैं, जो जीवन को सार्थक बनाने के लिए ज़रूरी हैं।”
शिविर निदेशक तपन मुखर्जी ने बाल नाट्य शिविर की जानकारी दी। उन्होंने बताया, इस शिविर की नींव विदुषी स्व. श्रीमती आशा कोटिया ने रखी थी। उन्होंने कहा, “कभी मेरे बच्चों ने इस शिविर में प्रशिक्षण लिया था और आज मुझे इस शिविर में आकर बच्चों को प्रशिक्षित करने का अवसर मिल रहा है।” पत्रकार प्रवीण जोशी ने कहा कि 15 दिवसीय इस शिविर के 60 घंटे बच्चों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने बच्चों से एक-एक पल का लाभ उठाने और दिग्गज हस्तियों के अनुभव से सीखने का आह्वान किया।
कार्यक्रम का संचालन श्रीमती सीमा व्यास ने किया। औपचारिक उद्घाटन के साथ ही शिविर की गतिविधियाँ शुरू हो गईं। तपन मुखर्जी ने बच्चों को पारंपरिक ‘हल्ला-गुल्ला’ गीत सिखाया, जिसका प्रतिदिन अभ्यास किया जाएगा। वहीं, सह-निर्देशक वरुण जोशी ने खेल-खेल में रंगमंच की बारीकियों का प्रशिक्षण शुरू किया। शिविर के पहले दिन बच्चे अत्यंत उत्साहित नज़र आए। (रिपोर्ट इनपुट और समन्वयन: श्वेता शर्मा, शिल्पा सिंघल, प्राध्यापिका, सारदा रामकृष्ण विद्या मंदिर, विजय नगर, इंदौर, मध्यप्रदेश) आगे – भवभूति और भास की कृतियां: मंच पर अकादमिक रंग प्रयोग https://indorestudio.com/nsd-plays-review-bhasa-bhavabhuti-karmankush-uttar-ramcharit/
अपनी बात को प्रभावी ढंग कहने की कला है नाटक: जयंत भिसे
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